Gareeb Ki Rakhi | गरीब की राखी

एक सप्ताह के बाद राखी का त्योहार है लेकिन राखी का बाजार अभी से सज गया है। लाल पीली राखियां सभी दुकानों की शोभा बढ़ा रही हैं। बहनें अपने भाई के लिए राखी तो भाई अपनी बहनों को उपहार में देने के लिए अभी से कुछ न कुछ खरीद रही हैं। 12 साल के रंजू एक चाय की दुकान पर काम करता है इस बार अपनी सात साल की दिव्यांग पेंशन गुड़िया को बहुत अनोखा उपहार देना चाहता है। रंजन इसके लिए जीतोड़ मेहनत भी कर रहा है।

यह भी पढ़ें :- Best moral stories

अरे भाई और कितनी देर लगेगी चाय मैं जल्दी लॉयर रंजन निकले हाथों में चाय की प्याली लिए उन ग्राहकों के पास आता है।

ये लीजिए साहब गरमागरम चाय रंजन के दिन की शुरुआत अलग अलग घरों में न्यूजपेपर डालने से होती है उसके बाद दस बजे तक वो चाय की दुकान में आ जाता फिर रात के नौ बजे तक यहीं रहता। इंट्रो उसकी भी ज्यादा नहीं थी। सुबह से रात तक वो अपना पसीना बहा रहा था ताकि अपनी बहन को राखी पर उपहार दे सके। गुड़िया रंजन की सगी बहन नहीं है। आज से तीन साल पहले की बात है। रात के दस बज रहे थे। रंजन पूरे दिन काम करके बहुत थक गया था और वो फुटपाथ किनारे बैठा पाव खा रहा था।

बहुत जोरों की भूख लगी है लेकिन एक पांव से क्या होगा पूरा दिन मालिक यहां जी जान लगा देता हूं। लेकिन बीस रुपये से वो ज्यादा देता ही नहीं।

रंजन का कोई घर तो था नहीं इसलिए वो काम खत्म करके और कुछ खाकर चाय की दुकान के सामने वाली फुटपाथ पर सो जाता था। आज भी वो सोने की तैयारी कर रहा था तभी उसकी आँखों के आगे एक बहुत बड़ा एक्सीडेंट के। बिकवाली को जोरदार टक्कर मार दी उस रिक्शे में पति पत्नी और एक चार साल की बच्ची थी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि मौके पर ही सभी की मौत हो गई। रमजान महीने में कम से कम ऐसे दो एक्सिडेंट तो देखता ही था आज भी उसने वो एक्सिडेंट देखा। ऐक्सिडेंट के बाद लगने वाली भीड़ को भी देखा। वो भी वहां भागकर गया।

पता नहीं लोग इतनी स्पीड में चलाते क्यों हैं। सभी के सभी मारे गए और एक बार पुलिस को खबर कर वो रेचल तलैया से पुलिस पुलिस के चक्कर में पढ़ोगे तो 50 सवाल पूछेंगे।

फिर धीरे धीरे लोग वहां से बातें करते हुए जाने लगे। रंजन भी वहां से जाने लगा तभी उस छोटी लड़की के शरीर में हलचल हुई। वो रोते हुए कहने लगी तो उसने उसे रंजू जैसी उस लड़की की आवाज सुनी उसके कान खड़े हो गए। उसने देखा कि वो छोटी सी लड़की अर्ध बेहोशी की हालत में है। उसका एक पैर रिक्शे के नीचे दबा हुआ है। रंजन ने जैसे ही ये देखा वो उसे निकालने की कोशिश करने लगा।

कितना भारी है। जरा सा भी नहीं रहता।

लेकिन वो कहते हैं न कि कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो रंजन की मेहनत का। वो इस बच्ची के पांव निकालने में कामयाब हो गया वो उसे लेकर अस्पताल की ओर भागा। डॉक्टरों ने बच्ची की हालत देखकर उसे तुरंत एडमिट कर लिया।

इसकी हालत बहुत खराब है। कौन है ये बच्ची तुम्हारी। डॉक्टर साहब मेरी तो कोई नहीं है। सड़क पर एक्सीडेंट हुआ था उसी में ये घायल हो गई थी। शाबाश तुमने बहुत नेक काम किया है उस बच्ची जिसका नाम गुड़िया था उसके पांव से बहुत खून बह गया था इसलिए डॉक्टरों को उसका एक पांव काटना पड़ा। रंजन हर दिन शाम को काम खत्म करके गुड़िया को देखने अस्पताल आता था। धीरे धीरे गुड़िया की हालत सुधरने लगी। रंजन को गुड़िया से बहुत लगाव हो गया था। वो हर दिन अस्पताल आता उससे बातें करता और कहता कि गुड़िया तो अब जल्दी ठीक हो जाएगी।

गुड़िया को पता लग था कि उसी ने उसकी जान बचाई है। उसे ये भी पता लग गया था कि उस दिन हुए सड़क हादसे में उसके माता पिता की मौत हो गई है। गुड़िया रंजन को भैया कहकर बुलाती थी। गुड़िया के मुंह से भैया सुनना रंजन को बहुत अच्छा लगता था। एक दिन जब वह अस्पताल आया तो उसने देखा कि गुड़िया बैसाखी के सहारे चुपचाप उदासी खड़ी हैं और एक गुड़िया। क्या हुआ तो उस तरह उदास क्यों खड़ी है गुड़िया कुछ बोलती उससे पहले ही डॉक्टर साहब वहां गए और उन्होंने उससे कहा कि गुड़िया बिल्कुल ठीक हो गई है। तुम इसे अपने साथ घर ले जा सकते हो।

ये कहकर डॉक्टर साहब वहां से चले गए। उनके जाने के बाद गुड़िया डॉक्टर साहब ने कहा कि तुम्हें घर ले जाओ तुम्हारा घर का है नीरज कहीं गई नहीं है भैया हम गांव से यहां आए थे। पिता जी को यहां एक कपड़े की फैक्ट्री में काम मिला था। पिता जी किराए का मकान ड्यूटी गए थे लेकिन मकान मिलने के पहले ही ये दोनों खुखुंदू स्थित हरि रोते क्यों हैं। रोने से क्या होगा। पूजा भइया तुम बच्ची अपने अपने घर ले चलो ना मेरे घर पर मेरा तो कोई गहरी नहीं है। मैं तो फुटपाथ पर रहता हूं भइया तो मैं भी फुटपाथ पर रह लूंगी।

रंजन अरे नहीं नहीं रुका रहेगी। क्या खाएगी क्या बीतेगी मैं तो खुद किसी तरह अपना पेट भरता हूं।

रंजीत इस बात को सुनकर गुड़िया फिर से रोने लगी और उसने रोते रोते उससे कहा ठीक है भइया रंजन गुड़िया को छोड़कर जाना नहीं चाहता था लेकिन वो क्या करता वो उसे कहां ले जाता क्या खिलाता क्या पिलाता कैसे उसकी देखभाल करता वो वहां से चला गया। उस रात सुखद बारिश हो रही थी रंजन फुटपाथ के पास ही एक पेड़ के नीचे खड़ा था लेकिन उसका ध्यान गुड़िया पर लगा हुआ था।

मैंने गुड़िया के साथ अच्छा नहीं किया तो उसे अकेले छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। मेरे जैसे ही उसका भी दुनिया में कोई नहीं है वह परिचारिका जाएगी या जिस बारिश में भागकर अस्पताल की तरफ जाने लगा लेकिन अस्पताल पहुंचने के कुछ देर पहले ही उसे गुड़िया दी गई वो बेचारी भी सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे बारिश से छिपने के लिए खड़ी थी। वो भागकर उसके पास गया तो रवैया बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। कुछ रेस्त्रा छोड़ कर चला गया।

नन्ही परियां अब तो अच्छी तो कुछ खाया है नहीं परियां मुझे धमकाने लगी हैं। राजे में बीजेपी जेब में दिखा पांच रुपए पढ़िए इसे पांच रुपए है मेरे पास बिस्किट खाएगी तो कुछ देर बाद बारिश बंद होगी। जनवरी में उन पैसों से बिस्किट खरीदा और गुड़िया को खाने को दिया। उस रोज गुड़िया भी उस

के साथ ही फुटपाथ पर सोयी लेकिन धीरे धीरे रंजन को गुड़िया की तरह बाहर रहना अच्छा नहीं लगने लगा। इसलिए उसने न्यूजपेपर बेचने का काम भी शुरू किया फिर साढ़े सात सौ रुपए किराए पर एक बहुत ही छोटा सा कमरा लिया। यही नहीं उसने चाय की दुकान के मालिक से भी कहा कि वह उसके पैसे थोड़ी बढ़ा दें। उसने उसके पैसे भी बढ़ा दिए।

एक दिन गुड़िया मैं तो पढ़ नहीं सका। अब लगता है कि पढ़ पाऊंगा लेकिन तू पढ़ेगी मेरी जैसी नहीं रहेगी।

रंजन ने गुड़िया का दाखिला एक स्कूल में करवा दिया। वो पढ़ने में बहुत होशियार थी। कभी कभी तो वह रंजन को भी कुछ न कुछ सिखाती लेकिन उसके स्कूल बहुत दूर था। बैसाखी के सहारे चलकर जानी में वो बहुत थक जाती थी इसलिए रंजन ने इस रक्षा बंधन पर उसे तीन भैया हाथ वाले साइकिल देने का सोचा था। राखी से एक दिन पहले की बात है रंजनी गुड़िया को कहा कि वो गुड़िया तो शाम को चाय की दुकान पर आ जाना। फिर हमदोनों कहीं जाएंगे आज उनकी बच्चियां। मुझे आपके लिए राखी खरीदनी है। वैसे हम जाएंगे कहां। रंजीत ने ये नहीं बताया था कि वो उसे तीन पहिया साइकिल देने वाला है लेकिन जैसे ही गुड़िया शाम को चाय की दुकान पर पहुंची उसकी तो रूह कांप गई। न जाने चाय की दुकान में कैसे आए लेकिन रंजना की लपटों में घिरा हुआ था और बचाओ बचाओ की आवाज सुनकर।

बचाओ बचाओ और उनको ही मुझे बचाओ।

लोगों ने भीड़ को बहुत लगा रखी थी लेकिन कोई उसकी मदद के लिए आ रहा था आवाज लगाता लगाकर वो बेहोश हो गया। गुड़िया ने जैसे ही ये सब देखा वह की परवाह किए बिना दुकान में चली गई और अपने भाई को बाहर ले आई। हालांकि उसे बचाने में गुड़िया थोड़ा जल्दी गई थी। रंजन भी जल गया था लेकिन पड़ोसी अस्पताल पहुंचे रंजन की हालत को देखकर तुरंत ही उसका इलाज शुरू हुआ। 24 घंटे बाद उसे होश आ गया। होश में आने के बाद उसे पता लगा कि किस तरह उसकी छोटी बहन ने उसकी जान बचाई है।

गुड़िया राखी पर तो भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन देते सुने तो अपने भाई की ही जान बचा ली। देखना मेरी ऐसी हालत हो गई है कि तेरा भाई तुझे कुछ दे भी नहीं पाया वो ये कर ही रहा था कि गुड़िया ने अपने कपड़े का एक छोटा सा टुकड़ा फाड़ा और उसकी कलाई पर बांधते हुए कहा कि मुझे कुछ नही चाहिए भैया साहब ठीकरा मेरे लिए यही सबसे बड़ा राखी का उपहार है।

अस्वीकरण :- यह कहानी Best Buddies Stories से ली गई है

Spread the love

Leave a Comment